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मंगलवार, 7 अगस्त 2012

भगवान, लोकतंत्र और दूध

आज मुझे इन्टरनेट पर मेरी लिखी एक कहानी की लिंक मिली. ये कहानी गणेश जी के दूध पीने की घटना को नेपथ्य में लेकर चलती है. मूल रूप से ये कहानी अप्रैल, २००८ में सृजनगाथा में प्रकाशित हुई थी. लिंक ये रही :

यहीं देखें:
भगवान, लोकतंत्र और दूध

सृजनगाथा पर देखें:
भगवान, लोकतंत्र और दूध

आप सबकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी...

बुधवार, 6 फ़रवरी 2008

रिश्ते...!

रद्दी अखबार में लपेट
घूर पर फेंका जाना जूते का:
कितना आसान है न
रिश्ते तोड़ना...???

मंगलवार, 29 जनवरी 2008

मुमकिन है,
मैं भूल जाऊँ तुम्हें,
एक दिन,
पर क्या कभी समझ सकूँगा:
"क्यूं प्यार किया था मैंने
तुम्हे...?"

यादें..!

जब मैं होता हूँ तन्हा
(जैसा कि मैं अक्सर होता हूँ)

जाने कहाँ-से निकल पड़ती हैं
यादें...

जाने वाले क्यूं नहीं ले जाते
साथ ही सब यादें...!

सोमवार, 1 अक्टूबर 2007

थक गया हूँ...

थक गया हूँ मैं
बीच राह में ही,
देखने लगा हूँ पाँव के छालों को
रूक कर मैं
बीच राह में ही...!

एक जूनून था मुझे
चलते ही जाने का,
जहाँ ना पहुँचा हों कोई
दुनिया वहीँ बसाने का,

पर कितना अकेला हो गया हूँ
बीच राह में ही...!!

थक गया हूँ मैं...

सुनाता था हर सफ़र का
होता है एक अंत भी,
मैं चला ऐसे सफ़र पर
मंज़िल नहीं जिसकी कोई,
ख़्वाब सारे टूटे शीशे
हासिल रही बस धूल ही,
थक गया हूँ मैं...

नहीं साथ कोई आया,
किसी को अपना ना पाया,
मैं रहा बनकर सभी का
किन्तु खुद को छ्लते रहने से
थक गया हूँ मैं...

अंत कर...अब अंत कर
इस सफ़र का अंत कर...


गुरुवार, 20 सितंबर 2007

रे मन...! (2)

खुद को छलना छोड़ दे मन
प्यार देकर दर्द लेना,
दूसरों के जीवन की खातिर
मौत से कर्ज़ लेना
छोड़ दे रे मन...!

ये नहीं तेरा ठिकाना
साँझ ढलते लौट जाना,
राह की परछाइयों में
व्यर्थ तेरा दिल लगाना,
कुछ नहीं हासिल अरे मन...!!
खुद को छलना छोड़ दे मन...

Will come more of it as the pain shall rise...

मंगलवार, 18 सितंबर 2007

Bhrastaachaar ke khilaaf...

आओ बहमन, आओ ठाकुर,
आओ कोली और कलवार,
लाला जी तुम भी आ जाओ,
आओ भंगी और चमार...
अलग-अलग है जात हमारी,
एक लहू हम सब का है;
और एक है शत्रु हमारा: शेषनाग-सा भ्रष्टाचार....!

आशा की कश्ती में छेदा
डगमग नइया बीच मझार,
रक्षक ही भक्षक बन बैठा
व्यापा चहुँ दिश हाहाकार;
डाकू सारे नेता बन गए
सो मत जाना पहरेदार...!!
आओ बहमन, आओ ठाकुर......



To be completed later....

बुधवार, 5 सितंबर 2007

तुम...(9)

रग-रग में दौड़ती तेरी याद,

अब खौलने लगी है...

सहा नहीं जाता

अब ये ताप अंतस का...!



झुलस रहीं हैं कलियाँ सपनों की,

नेह-सोते सूखे सभी...

और

फैलता आ रहा एक मरुथल

मन में कहीं...!!



छा जाओ फिर से

बनकर गदराई बदरी
मेरे तन पर,


मन पर,

जीवन पर....!!!

शुक्रवार, 24 अगस्त 2007

शुभ जन्मदिन...

ख़ुशी छलके, रंग झलके,
पूरे हों आपके सपन;
नाजुक क़दमों पर चलकर आये
सफ़लता आपके आंगन ।

अँधेरे सब दूर हों
रोशनी भरपूर हो;
दिव्यता से आच्छादित हो
तन-मन-जीवन ॥

मधुर गीत ओठों पे
नए स्वप्न आंखों में;
मधुमय बने ये
सारे पल-छिन ।।।

और क्या कहूँ
शुभ हो आपको
आपका ये जन्मदिन...!!!


For a friend on her birthday....

गुरुवार, 16 अगस्त 2007

तुम...(8)

तुम


बसे मेरे मन में
ज्यूँ ईश्वर का रुप,


पर ये तो मंदिर नहीं...


जहाँ लोग आयें,


सिर झुकाएं...


मांगे दुआ, पूरे हों उनके सपन...





ये तो है मयखाना
जहाँ,


आते हैं उदास पर जाते हैं झूमकर लोग...


पीछे रहा जाते हैं:


कुछ टूटे प्याले,


खाली बोतल,


और,


टूटे सपन...!!!

शनिवार, 21 जुलाई 2007

तूने मुझे क्या दिया रे मन...!

तूने मुझे क्या दिया रे मन...!
पराया दर्द,
पराई आस,
और उलझन...

अपना कुछ था नहीं,
पराया कोई रह नहीं,
शेष कुछ बचा नहीं...
हाथ आये तो बस
आंसू छलकाते नयन...!

दर्द सारी दुनिया का
तूने अपना कर लिया,
दुनिया-भर के आंसू दिल में
मोती-सा भर लिया,
अपनी खुशियाँ बाँट सबको
गया रिक्तपानि बन...!!

छोड़ कर सब चल दिए
राह में जो भी मिले,
तू सभी का हो गया
पर तू तेरा किसको कहे॥
साथ बस यादें रहीं
मकड़जाले बन...!!!

उम्र-भर छलता रहा
मुझको तू ओ मेरे मन...
व्यर्थ गया, व्यर्थ गया, व्यर्थ गया
ये जीवन...!!

तुम...(७)

कितने कम फूल

बचे हैं गुलमोहर के...!

कितनी कम साँसे मेरे पास,

फूल ज्यादा हैं या

साँसे कम, कौन जाने;



बस एक इंतज़ार:

'काश,
लौट आते कहीं से
तुम,

चाहे कोई नया इल्ज़ाम
देने के लिए ही सही...!'

शुक्रवार, 13 जुलाई 2007

मोड़...!

वहीँ खड़ा है गुलमोहर,
वैसे-ही महक रही रातरानी आज तक,
अभी भी नजर में है
वो पथरीली रहा,
और
वो मोड़,
जहाँ मिले थे हम;

मानता ही नहीं
ये पगला मन:
'तुम मेरे थे ही नहीं
कभी...'

कलेजे से लगाए बैठा है
एक दम तोड़ती आस:
'कभी तो
लौट आओगे तुम
मेरे ही पास...
पीछे सारी दुनिया छोड़...!'

इसी पागलपन में
खंगालता चल रहा हूँ मैं,
हर गली,
हर राह,
हर मोड़...!!


सोमवार, 9 जुलाई 2007

तुम...(६)

जाड़े की रात में
कसकर लपेटे शाल-सी
लिपटी है तन्हाई
मेरी आत्मा से,

तुम्हारे न होने के शून्य से आच्छादित
मैं,
सोचता हूँ:
'कुछ अस्पष्ट-से नाम,
आढ़ी-तिरछी रेखाएँ
मिटा नहीं सकते जिन्हें
हम चाह कर भी,
क्यूं उकेर देता है समय
हमारे हृदय पर...!!!'

मंगलवार, 26 जून 2007

रे मन...!

झुकना नहीं रे मन !

चाहे कड़ी धूप लगे,
क़दमों तले छाले पड़ें,
राह में थक कर
रुकना नहीं रे मन...!!

दूर तेरी मंज़िल है,
चलना तेरा हासिल है,
राह के छलावों में
फ़ंसना नहीं रे मन...!!

अंतस के ताप को,
दिए में ढाल ले,
अपने मनः-प्राण को
बाती-सा बाल ले,
आँधियों मे भी जल तू,
बुझना नहीं रे मन...!!!



To be completed later...

शुक्रवार, 22 जून 2007

तुम...(५)

कितना नजदीक ये आसमान,
चमकते थे मेरे सपने
तारों के साथ;

कितनी पास हर मंजिल,
कितनी छोटी राहें,
कितना गमकते फूल,
कैसा अंगार गुलमोहर,
सोने मढ़ा था अमलताश कल तक…!

कितने छोटे हुए ये हाथ,
टूटते तारे बने ख़्वाब,
दूर हों गयी हर मंजिल
और,
अंतहीन हर राह…
अब कहाँ फूल,
गुलमोहर उदास,
सिर झुकाए, एक-कोने
खड़ा गुमसुम अमलताश
आज क्यूं…?

‘क्या बदल गया रे मन…!’
मुड़कर देखा:
तुम नहीं थे साथ…!!!

मंगलवार, 19 जून 2007

सपने...(१)

हर कोई शामिल मेरे सपनों में:
भूखे की चाहत
एक अदद रोटी की,
गुड़िया-सी बिट्टी की
ख्वाहिशें छोटी-सी,
और सबसे छिपकर सिकुड़ी-सिमटी
तुम...!!!

चीर गयी दिल को
एक पीर खामोशी से
जब जाना,
किसी के भी सपनों में
मैं शामिल नहीं...!!!

शनिवार, 16 जून 2007

सच और मैं

रे सच!
फिर हार गया न…?
तू तो बना ही है
हारने के लिए.
अरे, अरे
तू तो रोने लगा!!
अच्छा..s--s--
बात दिल को लग गयी इसलिये;
अरे यार!
सदिया गुजर गईँ
पर तू रहा बेवकूफ का बेवकूफ,
अबे गधे
इतने दिन से लात-जूते खा रहा है
तब तो नहीं रोया
और आज,
आज तुझे मेरी छोटी-सी बात लग गयी!!
अच्छा सच!
सच बता,
क्या तू घुमक्कड़ था
जो चौदह बरस घूमता रहा वां में
वानर-भालुओं के साथ,
श्री-विहीन…?
कैसा लगा था तुझे
अनृत** पर विजय हेतु
शक्ति की चिरौरी करते…?
मगर,
तब तो तेरी आंखों से
चौदह बरस का निस्सहाय परिताप
नहीं निकला था
जल बनकर;
फिर आज क्यूं…?
यार सच!
देख मेरी आंखों में
और
सच बोल,
क्रॉस पर लटके-लटके
तुने सही होगी असीम पीड़ा
किन्तु
तब तो तू नहीं रोया;
फिर आज क्यूं…?
अच्छा चल
यही बता दे
विषपान करते समय
क्या छा गया था तेरी आंखों का आगे भी
मृत्यु का अँधेरा…?
किन्तु
तब तो तू हँसता रहा
फिर आज क्यूं रो रहा है…?
चल तुझे एक कहानी सुनाता हूँ…
ढ़ेर लग गया था मेरे पास
सिद्धांतो-आदर्शों और
सत्याप्रियता व न्यायप्रियता की लेमनचूसों का
जो बचपन से मुझे मिलती रहीं
गुरुजनों और परिजनों से
जब भी मैं
अन्याय के द्वारा लातियाये जाने पर
रोने लगा, तब.
मैंने सोचा,
शास्त्र कहते हैं…
अपरिग्रह
तो लाओ
आज बाँट दूँ
दो-चार लेमनचूस बच्चों और बूढों में.
तो यार!
मैंने,
सबसे पहले एक बच्चे को पकडा और
धर दिया उसकी नहीं हथेली पर
दो-चार लेमनचूस
मेरे बचपन वाले,
बच्चा तो खुश हों गया
(जैसे मैं होता था बचपन में)
पर उसका बाप
बाप रे बाप!
झपटकर छीना और
फ़ेंक दिया वो लेमनचूस,
और मुझे..s--
मुझे दीं जीं-भर के गालियाँ
मैं उसके बच्चे को बिगाड़ जो रहा था.
खैर,
मैंने हिम्मत नहीं हारी
और
जा पकडा एक ख्यातिप्राप्त समाज-सुधारक,
बुद्धिजीवी,
महामहोपाध्याय को
और झट धर दिया एक लेमनचूस
उनकी चौड़ी-चकली हथेली पर.
मुफ़्त का माल,
उन्होने गप-से मुह में डाला
किन्तु ये क्या,
उनका चेहरा क्यूं विकृत हो रहा है?
“आ..s-- क..s-- थू…s--”
बेचारा लेमनचूस मुँह से निकल
जा पड़ा कुदेदान में.
“क्यूं बे…s--
कुनैन की गोली दीं थी क्या?”
नहीं भाई,
ये तो सत्य की लेमनचूस है
जो बचपन में मुझे
आपने ही दी थी.
बस,
फिर क्या था
थप्पड़, लात, जूते
और जाने क्या-क्या…
खैर,
चेतनाहीन होने से पहले मैंने सुना…
“अबे गधे,
ये लेमनचूस तुझे दी थी
दूसरों को दिखाने के लिए
और तुने इसे मुझे ही खिला दिया…!!
दीदे फाड़कर देख ले
तेरी इस ‘सत्य की लेमनचूस’ की जगह
थूकदान में है
समझा…s--”
यार सच!
तुझे इतनी बढिया कहानी सुनाई
फिर भी तू रो रहा है!!
बस, यार बस
चुप हो जा
वरना
बह निकलेगी मेरी आंखों से भी
युगों की संचित
यह घनीभूत पीड़ा;
और
तब यही दुनिया
जो मेरी अवसरवादिताजनित नपुंसकता को
‘बुद्धिमत्ता’, ‘समायोजनशीलता’
आदि-आदि नामों से नवाजती है,
मेरी आत्मा के आंसुओं को
नामर्दी का खिताब दे देगी.
यार सच!
मुझे माफ़ करना,
मैं तेरे लिए रो भी नहीं सकता;
‘मर्द’ हूँ न
इसलिये.
..

* This poem has been published in ‘Amar Ujala’ (January 30, 1998; page 04).
**Anrit=Asatyaa

बुधवार, 6 जून 2007

तुम..(4)

तुम,
स्नेहिल छाया-सी
ईश्वर की,
सर्वत्र व्याप्त;
मुझे परिवेषि्ठत करती हुई...
कैसे दूर जाॐ...?

तुम...(3)

तुम,
कोई मीठी-सी याद
बचपन की,
चाहकर भी भूल नहीं सकता...!!