
शापित शिला-सा मैं,
युग-युग से बैठा
तुम्हारी प्रतीक्षा में मेरे राम...
पर,
तुम्हें नहीं आना था
और तुम नहीं आए...!
नदी में उभरे द्वीप-सा मैं,
निश्छल देख रहा चारों ओर उमड़ती जीवन की नदिया को,
मुझे छूकर गुजर रहा जीवन का जल
पर कितना असम्पृक्त-सा मैं
हर पल,
शायद मैं समझने लगा हूँ कि
जल के बीच शुष्क रहना मेरी नियति है...
या फिर इसी जल से धीरे-धीरे
कट-कट कर अपना अस्तित्व खोना
मेरी मजबूरी है...
जीवन से घिरा,
पर जीवन से दूर
ये कौन-सा जीवन है...!
तुम्हें आना था,
तुम आ गए...
तुम्हें जाना था,
तुम चले गए...
मैं न ये पूछ सका कि तुम आए क्यूं थे,
न तुम बता सके कि जाना क्यूं है...!
पूरी दुनिया साँस रोके देखती रही किस तरह हमारे जाबांज जवान आतंकवादियों का सफाया कर रहे थे मुंबई में। कितने लोग हताहत हुए, कितना नुकसान हुआ यह सब तो बाद की बात है...मुद्दा ये है कि हम इतने बेखबर कैसे हो जाते हैं कि कोई भी हमारे घर में घुसा चला आता है और हम चैन से सोये रहते हैं ...हमें जगाने के लिए दो-चार धमाके करने ही पड़ते हैं...!
मेरा अपना अनुभव है कि हमारी पुलिस फोर्स तो कत्तई इस तरह के हमले से निपटने लायक नहीं है। उनके पास न तो ऐसी ट्रेनिंग है और न ऐसे हथियार। और हमारी पुलिस फोर्स का एक बड़ा हिस्सा तो हमारे तथाकथित मान्यवरों की सुरक्षा में लगा रहता है जो अपने ही लोगों से असुरक्षित महसूस करते हैं...! पुलिस ट्रेनिंग को तरह से आधुनिक बनाने की जरूरत है। हमारे नेता ये कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि हम लोगों की एकजुटता को सलाम करते हैं। ठीक है कि लोग एकजुट हैं, पर आप क्या कर रहे हैं....?
मैं जानना चाहता हूँ हमारे नेताओं से कि वो दिन कब आएगा जब उन्हें प्रत्येक भारतवासी के जान अपनी जान जैसी ही कीमती लगेगी...? कब वो खुल कर कह सकेंगे कि अब अगर एक भी हिन्दुस्तानी का खून बहा तो हम आतंकियों और उन्हें शह देने वालों की ईंट से ईंट बजा देंगे...? कब इस देश में एक आम आदमी और एक राजनेता की जिंदगी एक समान कीमती समझी जायेगी...?
काश हम पढ़ सकते एक-दूसरे का मन
कागज़ पर लिखी इबारत की तरह,
शायद तुम मुझे गले से लगा लेना चाहते तब,
शायद मैं तुम्हे देखना भी न चाहता...
कितना अच्छा है न कि हमारा मन कागज़ नहीं है...!
p.s.: You can read something more regarding the economics behind political reactions to terrorism on: