शनिवार, 7 फ़रवरी 2009
समय का स्वरुप...!
अब थोड़ा आगे सोचते हैं...अगर हमने आने वाले समय को उसके आने से पहले-ही जान लिया तो क्या हम उसे बदल भी सकते हैं...! जैसे मैं देखा कि आने वाले समय में मेरे दोस्त की कलम उसके हाथ से छूट कर एक नदी में गिरने वाली है और ये कल ही होने वाला है। मैंने अपने दोस्त को ये बताया और उसने अगले दिन नदी की सैर पर जाने से पहले अपनी कलम घर पर ही छोड़ दी। जाहिर है अगर कलम है ही नहीं तो गिरेगी कैसे...? अगर मेरा दोस्त अपनी कलम गिरने से बचा पता है तो एक नया प्रश्न उठ खडा होता है: जो मैंने देखा था उसके अनुसार तो दोस्त की कलम इस समय नदी में होनी चाहिए थी किंतु ऐसा नहीं हुआ। अर्थात हमने आने वाले समय को बदल दिया...! एक बार फिर से रस्सी वाले उदाहरण की बात करें तो रस्सी का जो भाग हमने महसूस किया था, वो दरअसल है ही नहीं। तो फिर हमने उसे महसूस कैसे किया...? क्या एक बिन्दु के बाद रस्सी के दो अलग-अलग भाग हो जाते हैं...जिसमें से एक को मैंने महसूस किया और दूसरा फिर भी अनदेखा रहा...अगर मैंने भविष्य को देखने के बाद उसे बदल दिया तो वो भविष्य कैसे रहा...? दूसरी संभावना ये हो सकती है कि किसी प्रकार से मेरा देखा हुआ सच हो जाए। अर्थात मेरे दोस्त की कलम नदी में गिर ही जाए। इस संभावना में रस्सी तो ठीक-ठाक रहती है पर एक अलग प्रश्न खडा होता है: इस पूरे ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी हो रहा है और होने वाला है उसका खाका किसी ने पहले से ही खींच रखा है...! कोई शक्ति है जो समय को निर्धारित कर रही है, अब ये हमारे ऊपर है कि हम उस शक्ति को क्या नाम देते हैं।
पहले वाली संभावना जहाँ भविष्य को देखने के बाद उसव बदलने की गुंजाईश है यह इंगित करती है कि समय की कुछ समानांतर धाराएं हैं और अगर हममें सामर्थ्य है तो हम अपनी मनचाही धारा के समय को चुन सकते हैं...! इसका अर्थ ये भी है कि जिस ब्रह्माण्ड में हम हैं यह ही एक अकेला ब्रह्माण्ड नहीं है बल्कि ऐसे अनगिनत ब्रह्माण्ड मौजूद हैं...!
हम आगे पुन: चर्चा करेंगे इस प्रसंग पर...!
सोमवार, 2 फ़रवरी 2009
शापित शिला...!
शनिवार, 27 दिसंबर 2008
Watching Ghajini...!
अब उत्सुकता हो रही होगी न ये जानने के लिए कि अन्दर क्या नजारा था...! बस ऐसा लग रहा था कि पूरा गुवाहाटी सिनेमा हाल में समा गया है...फ़िल्म शुरू हुई...अपने शानदार इंट्री की...और जब पहली बार आईने के सामने आपने अपनी टी-शर्ट उतारी तो जैसे किसी ने दर्शकों को adrenaline का इंजेक्शन लगा दिया हो...पूरा हाल तारीफ़ के शोर से गूँज उठा...मैं भी मंत्रमुग्ध-सा देखता रह गया उस आमिर खान को जिसका फैन मैं sarfarosh dekh kar hua tha (Now I'll use English as my pc has stopped transliterating to Hindi)....
You know, people often commented that you were so thin and it seemed unbelievable to them to assume you as ACP in Sarfarosh. This issue was a bone of contention between them and me. But now, you looked unbelievable...My God...what a body...actually, speaking honestly, I was wondering how much you would have suffered to get this look...Really, I'm short of words for praise.
Now, come to the acting...It was again very natural...I loved watching you speaking through your eyes and face rather than tounge. Some scenes were really superb, like when you're watching Kalpana's face when she was offering you money that she had arranged after selling her car. Aamir! I could read waht was in your mind (as the character) at that time...ohh my God, she is giving me money which is so much for her...really touchy scene and a superb acting by both of you...You were again superb when you forgot why you've been there during the last fight...I wondered if you are really baffled where have you come...superb expression Aamir!
And in the last scene when Jiya gifted you the 'very especial thing', the first footprints of both of you, you really acted unbeleivably...I could feel what you were trying to purport...Also the cinematography of that particular scene was superb...the director also deserves cuddos for selecting that background and colour. Aamir, you gave execellant expression as a person who is suffering from such a peculiar problem as Short term memory loss and is also buring in fire of revenge...really, you deserve an Oscar for it...You deserved it for Taare Jameen Par also but there that little boy was not a bit behind you...but in Ghajini, you stole the show from all...Asin is exceptionally talented but your role was so challenging.Yesterday, I was watching your talk at AajTak but till then, unfortunately, I hadn't saw the movie so I didn't call.You know Aamir, why I'm a fan of you...Both of us are perfectionist...!
रविवार, 14 दिसंबर 2008
नदी और द्वीप...
नदी में उभरे द्वीप-सा मैं,
निश्छल देख रहा चारों ओर उमड़ती जीवन की नदिया को,
मुझे छूकर गुजर रहा जीवन का जल
पर कितना असम्पृक्त-सा मैं
हर पल,
शायद मैं समझने लगा हूँ कि
जल के बीच शुष्क रहना मेरी नियति है...
या फिर इसी जल से धीरे-धीरे
कट-कट कर अपना अस्तित्व खोना
मेरी मजबूरी है...
जीवन से घिरा,
पर जीवन से दूर
ये कौन-सा जीवन है...!
पहेली...
टुकड़े चुनने और
पहेली पूरी करने में गुजरती जिंदगी;
तमाम रेशे उधड चले,
सारे साथी बिछड़ चले,
सारे सपने बिखर गए,
पर लगा हुआ हूँ कि
कभी तो इस पहेली का हल पाऊंगा,
चाहे कितनी भी कोशिश कर ले हराने की
पर देखना जिंदगी, एक दिन
जरूर जीत जाऊँगा मैं...!
मंगलवार, 9 दिसंबर 2008
हम क्यूं छले जाते हैं...!
व्यर्थ सब नाते हैं,
जानते हुए भी क्यूं
हम
बार-बार छले जाते हैं...?
रविवार, 7 दिसंबर 2008
आना-जाना तुम्हारा...!
तुम्हें आना था,
तुम आ गए...
तुम्हें जाना था,
तुम चले गए...
मैं न ये पूछ सका कि तुम आए क्यूं थे,
न तुम बता सके कि जाना क्यूं है...!
सवाल...!
चाहे कितने वादे करें,
पर क्या
वो शामिल होते हैं जिंदगी में...!
जिंदगी से जाने वाले
चाहे कितनी कोशिश करें,
पर क्या
वो निकल पाते हैं जिंदगी से...?
पूछूँगा ये सवाल किसी दिन
जब मिलूँगा जिंदगी से...!!
रविवार, 30 नवंबर 2008
मुंबई में आतंक
पूरी दुनिया साँस रोके देखती रही किस तरह हमारे जाबांज जवान आतंकवादियों का सफाया कर रहे थे मुंबई में। कितने लोग हताहत हुए, कितना नुकसान हुआ यह सब तो बाद की बात है...मुद्दा ये है कि हम इतने बेखबर कैसे हो जाते हैं कि कोई भी हमारे घर में घुसा चला आता है और हम चैन से सोये रहते हैं ...हमें जगाने के लिए दो-चार धमाके करने ही पड़ते हैं...!
मेरा अपना अनुभव है कि हमारी पुलिस फोर्स तो कत्तई इस तरह के हमले से निपटने लायक नहीं है। उनके पास न तो ऐसी ट्रेनिंग है और न ऐसे हथियार। और हमारी पुलिस फोर्स का एक बड़ा हिस्सा तो हमारे तथाकथित मान्यवरों की सुरक्षा में लगा रहता है जो अपने ही लोगों से असुरक्षित महसूस करते हैं...! पुलिस ट्रेनिंग को तरह से आधुनिक बनाने की जरूरत है। हमारे नेता ये कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि हम लोगों की एकजुटता को सलाम करते हैं। ठीक है कि लोग एकजुट हैं, पर आप क्या कर रहे हैं....?
मैं जानना चाहता हूँ हमारे नेताओं से कि वो दिन कब आएगा जब उन्हें प्रत्येक भारतवासी के जान अपनी जान जैसी ही कीमती लगेगी...? कब वो खुल कर कह सकेंगे कि अब अगर एक भी हिन्दुस्तानी का खून बहा तो हम आतंकियों और उन्हें शह देने वालों की ईंट से ईंट बजा देंगे...? कब इस देश में एक आम आदमी और एक राजनेता की जिंदगी एक समान कीमती समझी जायेगी...?
रविवार, 23 नवंबर 2008
होना अकेला भीड़ में...
शुक्रवार, 21 नवंबर 2008
Road to El Dorado...!
गुरुवार, 13 नवंबर 2008
मन की बातें...!
काश हम पढ़ सकते एक-दूसरे का मन
कागज़ पर लिखी इबारत की तरह,
शायद तुम मुझे गले से लगा लेना चाहते तब,
शायद मैं तुम्हे देखना भी न चाहता...
कितना अच्छा है न कि हमारा मन कागज़ नहीं है...!
बुधवार, 5 नवंबर 2008
ये कहाँ जा रहे हैं हम...!
ये कहाँ जा रहे हैं हम…! अर्थशास्त्र में गुणक का सिद्धांता हमें बताता है कि किसी भी आर्थिक क्रिया पर जो प्रतिक्रिया होती है वह उस क्रिया की कई गुना होती है. मुझे लगता है कि गुणक का सिद्धांता हमारे जीवन के हर पहलू पर लागू होता है. हमारा एक कार्य समाज में जाने कितनी-ही प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है. जन्म लेने वाली प्रतिक्रिया का स्वभाव मूल क्रिया पर निर्भर करता है, यद्यपि इसके अपवाद भी हो सकते हैं. एक अच्छा काम और अच्छे कामों में तब्दील हो सकता है और बम-ब्लास्ट जैसा एक घृणित काम आगे चलकर मुस्लिमों पर जुल्म के रूप में भी सामने आ सकता है. क्या ये यहीं रुक जायेगा? कभी नहीं, क्यूंकि फिर से प्रतिक्रिया होगी और कुछ नया घटेगा जो बुरा ही होगा.
मेरी परीकथा में सब गड़बड़ होता जा रहा है…राक्षस ने तबाही मचनी शुरू कर दी है, लोग उससे डरे हुए हैं…कुछ लोग उसका विरोध भी करना चाहते हैं पर वो अकेले पड़ते जा रहे हैं, बेहद अकेले. राक्षस अट्टहास करता एक कोने से दूसरे कोने में दौड़ रहा है और जाने कितने बेगुनाह लोग उसके पैरों तले कुचले जा रहे हैं. दर्द की कराह धीरे-धीरे परी-देश को अपने चंगुल में लेती जा रही है. राजकुमार हैरान है…उसे लगता है कि अब हमारी परियों और छोटे-छोटे बच्चों का क्या होगा? बचपन में जब परिकथा में राक्षस आता था तो मैं चौक पड़ता था…रात में परियों के सपने के बीच वो घुस आता था और मैं चिहुंक कर उठ बैठता था। तभी माँ सर पर हाथ फेर कहती थी ‘बेटा सो जा, वो तो बस एक सपना था’। आज राक्षस सपने में पल-पल और भी अधिक डरावना होता जा रहा है पर ये बुरा सपना ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा; काश, कोई मुझे जगा दे और कहे ‘ये बस एक बुरा सपना था’…!
सोमवार, 3 नवंबर 2008
सपने बुरे भी हो सकते हैं...!
p.s.: You can read something more regarding the economics behind political reactions to terrorism on:
सोमवार, 13 अक्टूबर 2008
बुधवार, 6 फ़रवरी 2008
मंगलवार, 29 जनवरी 2008
यादें..!
(जैसा कि मैं अक्सर होता हूँ)
जाने कहाँ-से निकल पड़ती हैं
यादें...
जाने वाले क्यूं नहीं ले जाते
साथ ही सब यादें...!
सोमवार, 1 अक्टूबर 2007
थक गया हूँ...
बीच राह में ही,
देखने लगा हूँ पाँव के छालों को
रूक कर मैं
बीच राह में ही...!
एक जूनून था मुझे
चलते ही जाने का,
जहाँ ना पहुँचा हों कोई
दुनिया वहीँ बसाने का,
पर कितना अकेला हो गया हूँ
बीच राह में ही...!!
थक गया हूँ मैं...
सुनाता था हर सफ़र का
होता है एक अंत भी,
मैं चला ऐसे सफ़र पर
मंज़िल नहीं जिसकी कोई,
ख़्वाब सारे टूटे शीशे
हासिल रही बस धूल ही,
थक गया हूँ मैं...
नहीं साथ कोई आया,
किसी को अपना ना पाया,
मैं रहा बनकर सभी का
किन्तु खुद को छ्लते रहने से
थक गया हूँ मैं...
अंत कर...अब अंत कर
इस सफ़र का अंत कर...
गुरुवार, 20 सितंबर 2007
रे मन...! (2)
प्यार देकर दर्द लेना,
दूसरों के जीवन की खातिर
मौत से कर्ज़ लेना
छोड़ दे रे मन...!
ये नहीं तेरा ठिकाना
साँझ ढलते लौट जाना,
राह की परछाइयों में
व्यर्थ तेरा दिल लगाना,
कुछ नहीं हासिल अरे मन...!!
खुद को छलना छोड़ दे मन...
Will come more of it as the pain shall rise...
मंगलवार, 18 सितंबर 2007
Bhrastaachaar ke khilaaf...
आओ कोली और कलवार,
लाला जी तुम भी आ जाओ,
आओ भंगी और चमार...
अलग-अलग है जात हमारी,
एक लहू हम सब का है;
और एक है शत्रु हमारा: शेषनाग-सा भ्रष्टाचार....!
आशा की कश्ती में छेदा
डगमग नइया बीच मझार,
रक्षक ही भक्षक बन बैठा
व्यापा चहुँ दिश हाहाकार;
डाकू सारे नेता बन गए
सो मत जाना पहरेदार...!!
आओ बहमन, आओ ठाकुर......
To be completed later....
बुधवार, 5 सितंबर 2007
तुम...(9)
अब खौलने लगी है...
सहा नहीं जाता
अब ये ताप अंतस का...!
झुलस रहीं हैं कलियाँ सपनों की,
नेह-सोते सूखे सभी...
और
फैलता आ रहा एक मरुथल
मन में कहीं...!!
छा जाओ फिर से
बनकर गदराई बदरी
मेरे तन पर,
मन पर,
जीवन पर....!!!
शुक्रवार, 24 अगस्त 2007
शुभ जन्मदिन...
पूरे हों आपके सपन;
नाजुक क़दमों पर चलकर आये
सफ़लता आपके आंगन ।
अँधेरे सब दूर हों
रोशनी भरपूर हो;
दिव्यता से आच्छादित हो
तन-मन-जीवन ॥
मधुर गीत ओठों पे
नए स्वप्न आंखों में;
मधुमय बने ये
सारे पल-छिन ।।।
और क्या कहूँ
शुभ हो आपको
आपका ये जन्मदिन...!!!
For a friend on her birthday....
सोमवार, 20 अगस्त 2007
Trip to Ranchi
The place is so scenic...
I was enthralled...
गुरुवार, 16 अगस्त 2007
तुम...(8)
बसे मेरे मन में
ज्यूँ ईश्वर का रुप,
पर ये तो मंदिर नहीं...
जहाँ लोग आयें,
सिर झुकाएं...
मांगे दुआ, पूरे हों उनके सपन...
ये तो है मयखाना
जहाँ,
आते हैं उदास पर जाते हैं झूमकर लोग...
पीछे रहा जाते हैं:
कुछ टूटे प्याले,
खाली बोतल,
और,
टूटे सपन...!!!
शनिवार, 21 जुलाई 2007
तूने मुझे क्या दिया रे मन...!
पराया दर्द,
पराई आस,
और उलझन...
अपना कुछ था नहीं,
पराया कोई रह नहीं,
शेष कुछ बचा नहीं...
हाथ आये तो बस
आंसू छलकाते नयन...!
दर्द सारी दुनिया का
तूने अपना कर लिया,
दुनिया-भर के आंसू दिल में
मोती-सा भर लिया,
अपनी खुशियाँ बाँट सबको
गया रिक्तपानि बन...!!
छोड़ कर सब चल दिए
राह में जो भी मिले,
तू सभी का हो गया
पर तू तेरा किसको कहे॥
साथ बस यादें रहीं
मकड़जाले बन...!!!
उम्र-भर छलता रहा
मुझको तू ओ मेरे मन...
व्यर्थ गया, व्यर्थ गया, व्यर्थ गया
ये जीवन...!!
तुम...(७)
बचे हैं गुलमोहर के...!
कितनी कम साँसे मेरे पास,
फूल ज्यादा हैं या
साँसे कम, कौन जाने;
बस एक इंतज़ार:
'काश,
लौट आते कहीं से
तुम,
चाहे कोई नया इल्ज़ाम
देने के लिए ही सही...!'
गुरुवार, 19 जुलाई 2007
Why I’m not a Social Scientist...
Similar is the situation when one couldn't digest a bad cocktail of several subjects. They have reached the limit of their absorbing capacity of their brain. At this point of saturation, everything becomes fuzzy and incoherent. Enjoying this state of self-proclaimed bliss, they discover that they are Social Scientists…now they have entered a perpetual state of incoherence and fuzziness. A few noteworthy symptoms of this state are:
- People disbelieve every logical concept and conclusion as they’re too obvious to be true;
- They start looking (better, cooking) for links with a topic which were never in existence. Or in plain English, they look between the lines when there are no lines to look at all;
- They often proclaim themselves to be Omniscient and all others as ignorant. So by applying the reflexivity and transitivity axioms, every social scientist is ignorant (according to other fellow social scientists) and omniscient (as per him). Isn't it a rare phenomenon of being at the extremes simultaneously? The catch is in the frame of reference;
- They think that since they’re omniscient, their opinion on any subject is final and binding. Anyone who dares to differ must be thrown away to the Arabian Sea;
- If they come to discuss anything with a logical person, soon they take it as an argument, a challenge to their authority and now they’ll never agree with other’s point of view, whatever it may be. But don’t panic when they, at the very next moment, rephrase your logic in their words. Don’t ever try to tell them that you were saying the same as they’ll never agree about any possible similarity between these two arguments.
Should I hope that by now you would have understood why I'm not a Social Scientist...!!!
शुक्रवार, 13 जुलाई 2007
मोड़...!
वैसे-ही महक रही रातरानी आज तक,
अभी भी नजर में है
वो पथरीली रहा,
और
वो मोड़,
जहाँ मिले थे हम;
मानता ही नहीं
ये पगला मन:
'तुम मेरे थे ही नहीं
कभी...'
कलेजे से लगाए बैठा है
एक दम तोड़ती आस:
'कभी तो
लौट आओगे तुम
मेरे ही पास...
पीछे सारी दुनिया छोड़...!'
इसी पागलपन में
खंगालता चल रहा हूँ मैं,
हर गली,
हर राह,
हर मोड़...!!
सोमवार, 9 जुलाई 2007
तुम...(६)
कसकर लपेटे शाल-सी
लिपटी है तन्हाई
मेरी आत्मा से,
तुम्हारे न होने के शून्य से आच्छादित
मैं,
सोचता हूँ:
'कुछ अस्पष्ट-से नाम,
आढ़ी-तिरछी रेखाएँ
मिटा नहीं सकते जिन्हें
हम चाह कर भी,
क्यूं उकेर देता है समय
हमारे हृदय पर...!!!'
