बुधवार, 6 फ़रवरी 2008

रिश्ते...!

रद्दी अखबार में लपेट
घूर पर फेंका जाना जूते का:
कितना आसान है न
रिश्ते तोड़ना...???

2 टिप्‍पणियां:

जयप्रकाश मानस ने कहा…

संबंधों को रद्दी के साथ रखकर जिस बिम्ब का प्रयोग किया है आपने वह काबिले तारीफ़ है । चिंतन के लिए उकसाने वाली कविता के लिए कवि को बधाई

जयप्रकाश मानस ने कहा…

संबंधों को रद्दी के साथ रखकर जिस बिम्ब का प्रयोग किया है आपने वह काबिले तारीफ़ है । चिंतन के लिए उकसाने वाली कविता के लिए कवि को बधाई