बुधवार, 6 जून 2007

तुम..(4)

तुम,
स्नेहिल छाया-सी
ईश्वर की,
सर्वत्र व्याप्त;
मुझे परिवेषि्ठत करती हुई...
कैसे दूर जाॐ...?

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